27 सितंबर 2012

मैं ,पत्नी और ....प्रेम चोपड़ा



मेरे अन्दर काफ़ी देर से भावनाओं और यादों की उठा पटक हो रही है ।मेरे लिए समझना मुश्किल है की ये भावनाएं यादों का 'साइड इफ्फेक्ट है या यादें इन भावनाओं का आफ्टर इफ्फेक्ट' ।ये दोनों एक दुसरे पर पिली पड़ीं हैं ।लड़, यूं तो वो एक दुसरे के साथ रही हैं मगर धोबी पछाड़ मुझे पड़ रही है मैंने इन्हें रोकने की पुरज़ोर कोशिश पुरानी फिल्मों की उन हीरोइनों  की तरह कर रहा हूँ, जो की जो हर मार्मिक सीन के अंत में आँखें बंद कर आंसू रोकने की कोशिश में अपना होंठ काटने लगती हैं । पूरी श्रद्धा के साथ उन्हें कापी करनें के चक्कर में मैं दो बार अपने होंठ तक चबा बैठा हूँ ।

मेरी इस दयनीय हालत का ज़िम्मेदार सिर्फ एक टुच्चा सा वाकया है ।ये वाकया न ही अनोखा है और ना ही नया। ये बस यदा कदा पुराने चोले  छोड़ नए चोले पहन पुनावृत होता रहता है । हुआ यूं, कि किसी आम सी बात (जो उनके लिए शायद उतनी आम नहीं थी ) पर रूठ कर और मेरी मासूम सी बहस से चिढ़ कर पत्नी ने मुझे डांट दिया । इस डांट का मांझी फ़िर अपने ताने रूपी नैया में बैठा और धीरे धीरे आंसुओं की जल धारा में हिचकोले खाता हुआ सीन से विलीन हो गया । पीछे कमरे में मुझे छोड़ गया पत्नी विहीन और ग्लानि में लीन ।इस तरह के कन्फ्यूस्ड बर्ताव से मेरा सामना बचपन से ही होता आया है । मेरे पिताजी 'मल्टिपल पनिशमेंट डिसआडर' नामक रोग से ग्रस्त थे ।अर्थात उनकी ये विशेषता थी कि मेरी किसी गलती पर वे पहले तो वज़नदार गालियाँ देते फिर जम कर पीटते और उसके बाद मुझसे बात करना भी बंद कर देते । मैं मन ही मन यही गुज़ारिश करता रहता था कि श्रीमान जी, या तो आप गाली दें या पीट लें या सिर्फ बात करना ही बंद करें , जनाब एक गलती की थोक में सज़ाएं क्यों भला । 

यहाँ तो बात उससे भी एक कदम आगे की थी । यहाँ तो आंसुओं का 'नियाग्रा फाल' भी चालू था । मेरी हालत उस आउट आफ़ फार्म बल्लेबाज की तरह थी जो कि एक एक ऊबड़ खाबड़ पिच पर एक ही साथ ब्रेट ली की बाऊंसर ,कुंबले की गुगली और भज्जी का दूसरा झेल रहा हो ।पत्नी भी सारी गेंदें एक ही साथ ये सोच कर फेंकती हैं कि कोई एक बाल तो अवश्य डंडे उड़ा देगी। मेरे पास एक अकेला हथियार होता है मेरा तर्क रूपी बल्ला । गेंदे इसके आस पास से मुझे मुंह चिढ़ाकर निकल जाती हैं और मैं इन गेंदों को छू भी नहीं पाता हूँ । मैं अपने इस कमज़ोर, नकारा बल्ले को प्रमाणों के दस्ताने में मजबूती से पकड़ने की कोशिश करता रहता हूँ ।मेरी आत्म रक्षा के रूप में अगर कुछ होता है तो वो है संयम का फटा पुराना पैड, जिसमे से मेरी खीज गाहे बगाहे झाँकने लगती है । 

शादी के पहले चंद सालों में मैंने काफी कोशिश करी थी कि अपने गुस्से तथा चीखने के चौके छक्कों से मैं इन गेंदों पर जबरदस्त काउंटर अटैक  करा करूं | मगर उस लचर खोल की पोल बहुत जल्दी खुल गयी और पत्नी को पता चल ही गया कि इस शेर के ज़बड़े में दांत तो नाम के ही हैं । इस कसाई से चेहरे के पीछे एक डरा हुआ सा हलवाई है जो बहस के कुछ देर के भीतर ही या तो सर झुका कर हाथों से लड्डू बनाने लगता है या खिसिया कर बर्फी जैसी बत्तीसी दिखा देता है ।अब तो मुझे कभी चिल्लाने की कोशिश करते देख उनके चेहरे पर वैसी ही हंसी आती है जैसे हमें डैशिंग सचिन तेंडुलकर के मूंह से मरियल सा "आईला" सुन कर आती है ।खैर ,हमेशा की तरह मैं इस बार फिर क्लीन बोल्ड हुआ और उलटे पत्नी ही मुझे मैदान में छोड़ खुद पवेलियन अर्थात रसोई घर को प्रस्थान कर गयीं।

कभी कभी मेरा मन करता है कि  मैं फोन उठा कर ज़रा अपने मित्रों से ज़रा बारी बारी पूछूं कि "हे मित्र क्या नारी के ऐसे दिव्य रूप मेरे ही भाग्य में लिखे है या तुम्हारी तकदीर भी मेरी ही तरह बुलंद है? " । पर कुछ सोच के मैं ऐसा कर नहीं पाता हूँ । दिल के किसी कोने में भ्रम है की दोस्तों में मेरी छवि एक 'माचो मैन' की है । वो माचो मैन  जिसकी तस्वीर 'दीवारों पर मर्द,निराश न हों' के इश्तहार से लेकर नारियों के दिलो दिमाग पर छपी रहती है ।जिसको मेरे दोस्तों को दिखा दिखा कर उनकी पत्नियां कहती हैं  'ये देखो जी, ये होता है मर्द ...ऐसे बनो' । 

मुझे डर है कि उनसे बात करने से मेरी सारी कलई खुल जायेगी और वो संगमरमरी छवि चूर चूर हो जाएगी । मेरे दोस्त यह असलियत खुलने पर खुशी के मारे पूरे घर में लोट लगायेंगे , उनकी पत्नियां मुझे देख कर मुंह दबा कर हंसा करेंगी और फिर उनके मन मंदिर में मेरी जगह मेरी पत्नी की तस्वीर सज जायेगी । यह भयावह बात हर बार मुझे यह बेजा हरकत करने से रोक देती है और इसी वजह से दिल की बात दिल ही में और घर की बात घर में ही रह जाती है।

बहरहाल, मैदान अर्थात बेड रूम के एक कोने में मैं इस तरह पडा था जैसे किसी वाशिंग मशीन से ताज़ा ताज़ा निकाला हुआ निचुड़ा कपड़ा । यही वो पल था जब भावना बाई और उस्ताद याद खां  के बीच जवाबी कव्वाली शुरू हो गयी और मैं किसी सम्मोहित श्रोता की तरह उसमें खो गया । वो दिन आँख के सामने डमरू बजाने लगे  जब मैं स्कूल में पहले मास्टर और बाद में घर पर मां  पिताजी की झाड़ खा कर यही सोचता था की वो शुभ दिन कब आयेगा जब मैं अपने पैरों पर खडा हो जाऊंगा । रोज़ रोज़ की डांट और पिटाई से तो मुक्ति मिलेगी । तब ये न जाना था कि  हालत बद  से बदतर हो जायेगी। अब भी कभी कभी श्रीमती जी की डांट खाते वक्त मुझे ऐसा लगने लगता है जैसे क्लास में मास्टर साब झाड़ रहे हैं और बोलने वाले हैं कि "मूर्खानंद चलो बेंच पर खड़े हो जाओ" या "डफर कहीं के ,कान पकड़ो और दीवार की तरफ मुंह कर लो" ।

कभी कभी ऐसे सु अवसरों में मुझे ऐसी हालत में देख मेरा नौजवान पुत्र  गद्गद  होकर मुस्कुरा उठता है । ये मुस्कराहट कुछ ऐसी होती है जैसे चुइंगम चबाता हुआ प्रेम चोपड़ा अपने गैंग  के सामने नाचती हुयी जीनत अमान को देख एक होंठ ऊपर किये मुस्कुरा रहा हो ।उसे देख कर मुझे ठीक वैसी ही झेंप होती है जैसे बचपन में क्लास से निकाले जाने पर तथा वहाँ से गुजरने वाले साथी छात्रों के छेड़े जाने पर होती थी । कम से कम उन दिनों ये तो नहीं होता था पहले डांट खाओ फिर खुद ही डांटने वाले के आंसू भी पोछने जाओ । 
आज भी अपनी ये हालत देख कर किसी शायर का एक शेर याद आ गया है ,जो कुछ यूं है
 ' तब तो घबरा कर कहते थे कि मर जायेंगे अब 
   मर के भी चैन न पाया है, किधर जायेंगे अब '

आप में से कुछ कुंवारे पाठक इन सब बातों वर विश्वास न कर रहे हों या शायद ये सोच कर हंस रहे हों कि  'एक शेर सुनाने का मन था तो कितना नाटक' । भई मैं तो जा रहा हूँ रसोई घर की तरफ, अपनी जीवन संगिनी को मनाने ।जाते जाते लेकिन उन भाई लोगों की खिदमत में यही अर्ज़ करता हूँ  
' हालत मेरी देख बेटा, आज तू मुझ पर हंसेगा 
कब तक खैर मनायेगा, कल तू भी फंसेगा ' ।