08 सितंबर 2026

'वो शहर'



सुबह तूफानों भरी हर रात में बहाव है
सुराख़ सीनों में लिए बह रही हर नाव है

गांव की नींदों में सपने रोज़ शहरों के रहे
शहर की आँखों में अक्सर जागते अब गाँव हैं

भाग कर निकली थी आगे मुड़ के क्यों हैं देखती
दौड़ती उन हसरतों के शायद थके अब पाँव हैं

धुंधली सी यादों ने आकर इतना तो दिखला दिया
भर गए ज़ख्मों में जिंदा आज भी कुछ घाव हैं

धूप में जलता वो बूढ़ा  पेड़ सबसे कह रहा
और थोड़ी देर बैठो मुझमें अभी भी छाँव है


- योगेश शर्मा 

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