09 सितंबर 2026

" वो शहर "



सुबहें तूफानों सी हर रात में बहाव है
सीने में सुराख़ लिए बहती हर नाव है

गांव की नींदों में हर शब् शहरों के ही सपने थे
शहर की आँखों में अक्सर अब जागता एक गाँव है

भाग के निकली थीं आगे मुड़ के क्यों है देखती
दौड़ती उन हसरतों के थके हुए अब पाँव हैं

जीवन का जुआख़ाना भी ऐसा गोरखधंदा है
नहीं चला तकदीर थी ग़र चल गया तो दांव है

धुंधली यादों से मिलकर फिर से ये एहसास हुआ
भरे हुए ज़ख्मों में जिंदा शायद कोई घाव है

धूप में जलता बूढ़ा पेड़ सबसे कहता रहता है
ठहरो थोड़ी देर रुको मुझमें काफ़ी छाँव है


- योगेश शर्मा 

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