12 अप्रैल 2010

'पहली बारिश'









खेत पड़े हैं बंजर मेरे, बरसों के,
भूल चुका हूँ, गेहूं के या सरसों के,

पानी की उम्मीद में साँसे रूख गयी हैं,
बादल तकते तकते नज़रें सूख गयी हैं,

दुआ मांगने को हाथों में जान नहीं है,
अब तो बरसो आँखे भी हैरान हुई हैं,

भूख रही, न जान रही बस प्यास बची है,
बरसेगा,एक रोज़ यही उम्मीद बची है,

छांव सी इक, लगता है सर पे आई है,
थोड़ी थोड़ी हवा चली, क्या  पुरवाई है?

ऊपर कुछ काला सा है,बदरी तो नहीं है?
टपका है गालों पे कुछ,आंसू तो नहीं है,

नहीं नहीं ख्वाब नहीं, ये तो बारिश है!
आस में जिसकी ज़िंदा था, ये वो बारिश है,

जीने की उम्मीद जो दे,ये वो बारिश है,
कुछ करने की चाहत दे, ये वो बारिश है,

बूँद बूँद से शुरू हुई,अब बढ़ने लगी है,
खेतों में थी, अब आँगन में पड़ने लगी है,

दुःख झेले थे जो भी, सारे भूल गया हूँ,
सावन के संगीत में, सब कुछ भूल गया हूँ,

लगता है, जीवन की ये पहली बारिश है,
आस में जिसकी जिंदा था, ये वो बारिश है


- योगेश शर्मा