18 अक्तूबर 2011

'ज़रा ये भी सिखा'




मेरी रातों के अंधेरों में चमकने वाले
तू कभी दिन के उजाले में बहारें भी दिखा
चल दिया मेरी धड़कनों को तरन्नुम देकर   
बिन तेरे कैसे जिया जाए ज़रा ये भी सिखा

दिल की हसरत बड़ी ग़ुमनाम रही हैं अब तक
तेरी चाहत मेरा ईनाम रही है अब तक
अपने जज़्बात को जाने क्यों कफ़स में है रखा 

उनको तन्हाई के पर्दों में छिपा रखा था
हमने ज़ख्मों को हमराज़ बना रखा था
वक्त आया है, उन्हें अब दें ज़माने को दिखा

ख़ुदा को नेमतों का जब शुक्रिया कर लेता हूँ
कोशिशें हाथों को पढ़ने की भी कर लेता हूँ
ढूँढता हूँ अगर मिल जाए कहीं तू भी लिखा

मेरी रातों के अंधेरों में चमकने वाले
कभी तू दिन के उजाले में बहारें भी दिखा |




- योगेश शर्मा