12 नवंबर 2011

'अजनबी'



अपनों को इस कदर न जान लो कभी
अपने ही घर में ख़ुद से हो जाओ अजनबी

ये होंठ कई बार ख़ामोशी उगलते हैं 
हर बात कुछ कहे ज़रूरी नहीं कभी

ज़्यादा अलग नहीं हैं एक दुसरे से लोग 
ख़ुद की जुदा है सोच यही सोचते सभी


समझा सके  हम ख़ुद को किसी तरह 
 दुनिया के वास्ते हैं ये फ़लसफ़े सभी

 यूं तो भर दिया है हर ज़ख्म वक्त ने
दिल पर जमे हुए से कुछ नक्श हैं अभी


जाते हुए क़दमों के, निशाँ होंगे रास्तों पे
उनके ही सहारे आ जाना फिर कभी





- योगेश शर्मा