10 मई 2010

एक गुन्चा, एक पेड़




साए तले दरख़्त के, इक नया पौधा खिला
खुश हुआ दरख़्त, चलो एक साथी तो मिला !

परवान पौधा चढ़ा, उस पेड़ के ही साए में,
आँधियों में लिपटा कभी, सर्दियों में सिमटा उसमे,

धूप झुलसाती तो, पत्तियां पेड़ की मरहम बनती
छाँव उसकी, गुन्चे के खेल का आँगन बनती,


धीरे धीरे एक दिन, पौधा बड़ा जब हो गया,
लगा सोचने, पेड़ से नुक्सान कितना हो गया ?


टहनियों से कमबख्त की, ऊंचाई मेरी रुक गयी
कैसे पनपूं, शाखों को नज़र इसकी लग गयी,

और कद थोड़ा बढ़ा , तो ख़ुद पे ही इतराने लगा ,
धीरे धीरे वो नासमझ, पेड़ से कतराने लगा,

बस घूरता था पेड़ को आँखें लिए जलती हुई
पेड़ सूखा सोच सोच, आखिर कहाँ गलती हुई

पेड़ मायूस पौधे से, पौधा पेड़ से रंजूर है ,
फासले न के बराबर, पर दिल कितने दूर हैं

अब पेड़ तन्हाई में खुश, पौधा है ख़ुद में मगन,
रह गयी बस टीस इक, थोड़ी कसक थोड़ी चुभन |

- योगेश शर्मा