15 जून 2025

'सौ झूठ गढ़े'



सौ झूठ गढ़े जीने के लिए
फिर सच उनको ही मान लिया
हर लम्हा कुछ मारा ख़ुद को
और उसको जीना मान लिया

ख़्वाहिश ख़्वाब तमन्ना ज़िद
कुछ पता नहीं क्या पाया है
अब इस वक़्त के जंगल में
अपने को खोया मान लिया

नाकाम रहे समझने में
दुनिया और दुनियादारी को
थक के तनहा बैठे जब
अपने को थोड़ा जान लिया

मंज़िल पर पहुँच के ये जाना
मंज़िल कोई एक नहीं होती
 क्यों चलने में रस्तों का फिर
बेकार ही में एहसान लिया

सौ झूठ गढ़े जीने के लिए
फिर सच उनको ही मान लिया


- योगेश शर्मा 


2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी कविता जीवन के अनुभवों और आत्ममंथन को बहुत सादगी से सामने रखती है। हर अंतरा किसी न किसी सच से हमारा सामना कराता है। बहरहाल, मेरा यहाँ आने का एक कारण और भी है। हम लोग मुंशी प्रेमचंद जी की आगामी पुण्यतिथी ३१ जुलाई २०२६ के अवसर पर प्रेमचंद महोत्सव के अंतर्गत "५० दिनों में ५० कहानियाँ" बनाने, सुनाने (और जुटाने की भी!) की ओर प्रयासरत है. अगर आपकी रूचि हो तो इस अभियान में आपका सहर्ष स्वागत है.

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