03 जुलाई 2016

'कई बार ये भी होता है'






कई बार ये भी होता है
आये नज़र न हमसफ़र
पर साथ कोई होता है
कई बार ये भी होता है

सोते हुए भी यूं लगे
शब् कट रही है जगे जगे
तन्हाई हो, पहलू में पर
एहसास एक सोता है

कई बार ये भी होता है

हो अजनबी कितना सफ़र
अपनी लगे हर रहगुज़र*
कभी छाँव साथ कभी धूप का
कंधे पे हाथ होता है

कई बार ये भी होता है

ये राह के पर्वत कभी
संग चलते हों जैसे सभी
जो दिखते हैं थमे थमे
उनका सफ़र भी होता है

कई बार ये भी होता है

 देखा है ये कितनी ही बार
ताबीर की फ़स्ले -ए -बहार
है काटता कोई और ही
और सपने कोई बोता है

कई बार ये भी होता है

कभी कहकहों सी सुबह खिले
कहीं ग़म की सूनी सहर मिले
पाने की क्यों खुशियां नहीं
खोने का दर्द होता है

कई बार ये भी होता है
     कई बार ये भी होता है....


* रहगुज़र - रास्ता


योगेश शर्मा 

06 फ़रवरी 2016

'आवारा हवाएं'



पते बस मज़ारों के पुराने नहीं होते
आवारा हवाओं के ठिकाने नहीं होते

थम जायेगी जब थक के तो अपना बयाँ देगी
चलती हुयी धड़कन के फ़साने नहीं होते

उसके मशवरे पर जो ख़ार उगा लेता
बाग़ों में मेरे तब ये वीराने नहीं होते

अपनी ज़मीं से थोड़ा हम और जुड़े होते
रिश्ते जो आसमां से निभाने नहीं होते

खुशियाँ, नसीब, नाते तो कबके हो गए गुम  
ये दर्द ही कम्बख़्त बेगाने नहीं होते

वो आज भी लोगों से गले लग के मिलता है
कुछ लोग उम्र भर तक सयाने नहीं होते

आवारा हवाओं के ठिकाने नहीं होते...



- योगेश शर्मा

22 दिसंबर 2015

'मन के घोड़े'


मन के घोड़े कभी न थकते
न होते बोझिल न हाँफते
नहीं झुलसते कभी धूप में
कभी ठंड से नहीं कांपते

 इन पर यादों की कसे लगाम
अपनी आँखों को बंद किये
कुछ जाने अनजाने सपने
उड़ता अपने संग लिए,

न वक्त की कोई हद रहती,
न, उम्र का ही होता एहसास,
जितना ही ऊपर जाता हूँ
उतना ख़ुद के आ जाता पास

 
न देखता हूँ कुछ और मैं फ़िर
 किसी को  दिखता तब मैं
छा जाए गहरी ख़ामोशी
मेरे साथ रहे इक बस 'मैं'

आते पल और गुज़रे कल
दोनों एक हो जाते हैं
ख्वाब की मंजिल होश के रस्ते
सब मुझमें खो जाते हैं

 
बस मैं और मेरे घोड़े, जो
बेसाख़्ता दौड़े जाते हैं
इस दुनिया के अंदर ही
दुनिया कोई और दिखाते हैं |


 

- योगेश शर्मा

12 अगस्त 2015

'कुछ रंज बहे होंगे'


कुछ तंज सुने होंगे कुछ रंज बहे होंगे
कुछ तीर चले होंगे कुछ संग* सहे होंगे

कुछ लफ्ज़ डरे होंगे पर्दों से निकलने में
नज़रों से रह रह कर ज़ाहिर तो हुए होंगे

सीने के तूफाँ  को मुट्ठी में कसा होगा
सैलाब ने माथे पर कुछ हर्फ़ जड़े होंगे

समझाया तो होगा कुछ हालात ने ज़ेहन को
और साथ में आने तक थोड़ा तो लड़े होंगे

मुश्किल जब हुआ होगा यूं और जो चुप रहना
होंठों ने दिल को ही अफ़साने कहे होंगे

छोटा सा दिलासा तब ख़ुद को दिया होगा
कि ज़ख्म जो बंजर थे अब फिर से हरे होंगे

कुछ तंज सुने होंगे कुछ रंज बहे होंगे..............


*हर्फ़ - लिखावट,  संग - पत्थर



- योगेश शर्मा 

02 अगस्त 2015

'दिल ढूँढ ही लेंगे'


बर्फ के सीने में तपिश ढूंढ ही लेंगे
चलती हुयी धड़कन हैं दिल ढूँढ ही लेंगे

मिट्टी की महक अपनी  साँसों में बसाई है
परदेस में भी अपना वतन ढूँढ ही लेंगे

हसरत के सफ़ीने* को तूफ़ाँ में उतारा है
नाकाम दुआओं में असर ढूँढ ही लेंगे

तन्हाई की बस्ती है खामोश हैं बाशिंदे
नज़रों में कहीं उनके बयां ढूँढ ही लेंगे

छलनी हुए पैरों ने कुछ सँग* बटोरें हैं
उनमें से कोई अपना ख़ुदा ढूँढ ही लेंगे

चलती हुयी धड़कन हैं दिल ढूँढ ही लेंगे 


*सँग - पत्थर , सफ़ीने -जहाज़ 


- योगेश शर्मा 

02 अप्रैल 2015

'मैं कैसे झाँकू'



झाँकू भला मैं कैसे तेरी रूह की गहराई में
नज़रें उलझ जाती हैं तेरे जिस्म की परछाई में

डगर दिल तक पहुँचने की नज़र आती नहीं है
निगाहें इस बदन के बाद कुछ पाती नहीं है

करी हैं कोशिशें अपनी मोहब्बत ही दिखाने की
नज़र छलकाती है लेकिन तमन्ना तुझको पाने की

हवस को इश्क़ कह कर खुद को बहलाया भी करता हूँ
कहीं तू पढ़ न ले मुझको ये अक्सर सोच डरता हूँ

मेरी शर्मिंदगी दिन में हज़ारों बार डँसती है
ज़हन की सर्द आवाज़ें कभी बे गैरत भी करती है

मज़ा सा आता है फिर भी मुझे रुसवाई में
मग़र फिर पूछता हूँ दिल से ये तन्हाई में

झाँकू भला मैं कैसे तेरी रूह की गहराई में
नज़रें उलझ जाती हैं तेरे जिस्म की परछाई में

झाँकू भला मैं कैसे तेरी रूह की गहराई में. . . 


 
- योगेश शर्मा 

14 मार्च 2015

'ऐ ज़िन्दगी'


ऐ ज़िन्दगी
क़दमों में साँसे डालती रहना
गिरने दे अभी 
फिर कभी संभालती रहना

राहों में लड़खड़ाने का
दे लाख मुझे खौफ्
उठने का जिगर
मुझमे बस पालती रहना

 हकीकतें ज़मीं की 
दामन जो पकड़ लें
सपनों की तरफ फिर मुझे 
उछालती  रहना

ज़ख्मों पे अपने, अश्क भले 
बर्फ हों जाएँ
ग़म - ए- जहाँ पे दोस्त 
लहू उबालती रहना

ऐ ज़िन्दगी
क़दमों में साँसे डालती रहना।।




- योगेश शर्मा

02 दिसंबर 2014

'कस के मुझपे वार करो'

संपादित एवं पुनः प्रकाशित 




हूँ गुनाहगार तो क्यों न संगसार करो ,
उठाओ पत्थर और कस के मुझपे वार करो

कहा तुमने हैं दलीलें मेरी सब बेबुनियाद
मैं कर रहा हूँ कबसे तुम्हारा वक्त बर्बाद
इनकी बेबाकी से लेकिन डर चुके हो तुम
कहना बाकी है मग़र फैसला कर चुके हो तुम
लहू निकालो,चलो कपड़े तार तार करों
मेरे गुनाह के फ़ोड़ों को ज़ार ज़ार करो
उठाओ पत्थर, कस के मुझपे वार करो

में  कभी तुमसे, तुम्हारे गुनाह ना पूछूंगा 
न  मुफ़लिसी,न अपनों का वास्ता दूंगा
न  कहूंगा तुम्हें मुंसिफ  बनाया किसने है ?
मुझे भी उसने गढ़ा, तुमको  बनाया जिसने है
खैर छोड़ो, इन बातों को दरकिनार  करो
बड़े शौक़  से इन्साफ का क़ारोबार करो
उठाओ पत्थर, कस के मुझपे वार करो

मैं जानता हूँ, ख़ुदा का है ये दरबार नहीं
है ग़र गुनाह, तो सज़ा मिलनी है दो बार  नहीं
मिली यहाँ जो सज़ा तो ख़ुदा की रहमत होगी
और बेगुनाही का हासिल थोड़ी जन्नत होगी
तीर एहसान का मेरे दिल के आर पार करो
जिया गुमनाम सा पर मौत शानदार करो
उठाओ पत्थर और कस के मुझपे वार करो

हूँ गुनाहगार तो क्यों न संगसार करो
उठाओ पत्थर और कस के मुझपे वार करो।



- योगेश शर्मा


01 अगस्त 2014

'साथ अपने अपनी ही आवाज़ है'


चाहे कोई नाम लेकर न पुकारे
साथ अपने अपनी ही आवाज़ है
खुश न हो ऐ वक्त मेरे पर क़तर कर
हौसलों की बाकी अभी परवाज़ है

 दिल के फ़लक पे टाँके फिर से ख्वाब सारे
चल पड़ा नज़रों में भरकर चाँद तारे
ज़माने का था गुज़रा कल मेरे संग आज है
साथ अपने अपनी ही आवाज़ है

बढ़ चला अपने इरादों का सफ़ीना
करेगी चाक पतवारें तूफानों का सीना
नयी हैं कश्ती- ए-मंज़िल नया आगाज़  है
साथ अपने अपनी ही आवाज़ है

खुश न हो ऐ वक्त मेरे पर क़तर कर
हौसलों की बाकी अभी परवाज़ है.. . 

 



- योगेश शर्मा 

15 मई 2014

' हुक्मराँ '


हैं हमसफ़र कहाँ हम बस रास्ते दिखाएं
फितरत नहीं हैं उनकी चिराग़ों से दिल लगाएं

महफूज़ यूँ बहुत हैं तेरा सर पे हाथ पाकर
तेरी आस्तीं के हमको कहीं सांप डस न जाएँ

ज़्यादा ग़िला नहीं है हमें उनकी रहबरी से 
कोशिश मगर रहेगी कि वो भी लुट के जाएँ

हमने खिज़ा के दम पर गुलशन सजा लिया है
बहारों से जा के कह दो कहीं और आयें जाएँ

मज़लूम बाज़ुओं ने उठा लिए हैं पत्थर 
है हाकिमों में दम तो शीशे के घर बनाएं

दोस्ती बहुत की, अरमान अब यही  है
दुश्मनी में हमको कहीं आप कम न पाएं

हैं हमसफ़र कहाँ हम बस रास्ते दिखाएं।



- योगेश शर्मा